मिथलाक पावन चौरचन और गणेश जन्मोत्सव की बधाई
Madhwapur, madhubani
समस्त मिथिला वासी के kishun bhaijee की तरफ से गणेश पूजा एवं गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस साल गणेश चतुर्थी 22 अगस्त यानी शनिवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन लोग अपने घरों या मोहल्लों में गणेश जी की प्रतिमा लेकर आते हैं। निश्चित दिनों के लिए उनकी सेवा कर कुछ दिन बाद उनका विसर्जन करते हैं। 10 दिन तक चलने वाला यह गणेशोत्सव 1 सितंबर को पूर्ण होगा
चतुर्थी के पीछे का इतिहास :-
एक दिन भगवान शिव भोगवती नामक स्थान पर गए। देवी पार्वती कैलाश पर अकेली थीं। उस समय उनके मन में संतान की इच्छा उत्पन्न हुई। उन्होंने अपने शरीर का मैल एकत्र किया। उस मैल से एक बालक का शरीर बना कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा की। देवी ने उस बालक को कहा कि आज से तुम मेरे पुत्र हो। अब मैं स्नान के लिए अंदर गुफा में जा रही हूं। तुम किसी भी पुरुष को भीतर ना आने देना।
देवी पार्वती की आज्ञा मानकर गणेश गुफा के बाहर पहरा देने लगे। तभी भगवान शिव भोगवती से लौटकर कैलाश आए। जब भगवान शिव ने गुफा के भीतर जाना चाहा तो गणेश ने उनका रास्ता रोका। देवी पार्वती से मिलने से रोकने के कारण भगवान शिव गणेश पर क्रोधित हो गए। गणेश से कहा कि मुझे भीतर जाने दो वरना मैं तुम्हारा शीश तुम्हारे शरीर से अलग कर दूंगा। इसके बावजूद गणेश जी भगवान शिव का रास्ता रोक कर खड़े रहे।
भगवान शिव ने इससे क्रोधित हो अपने त्रिशूल से गणेश जी का शीश उनके शरीर से अलग कर दिया। देवी पार्वती को जब इस घटना की सूचना मिली तो वह रोती हुई भगवान शिव के पास आईं और बोली – हे भगवन, आपकी अनुपस्थिति में मैंने अपने मैल से एक बालक की रचना की थी। आपने उसका शीश क्यों काट दिया।
भगवान शिव को जब यह पता चला तो उन्होंने अपने गणों को आज्ञा दी कि जो भी माता अपने बालक की ओर पीठ कर सो रही हो। उसके बालक का शीश ले आओ। जंगल में एक हथिनी अपने बच्चे की ओर पीठ कर सो रही थी। भगवान शिव के गण हाथी का शीश लेकर कैलाश पहुंच गए। तब हाथी का शीश लगाकर भगवान शिव ने गणेश चतुर्थी जी को जीवित किया। तब से ही भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है
भगवान गणेश (Ganesh Chaturthi 2020) को हिंदू धर्म में प्रथम पूजनीय माना जाता है. किसी भी शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा की जाती हैं. ग्रह प्रवेश और भूमि पूजन से पहले हर बार गणपति को पहले पूजा जाता है. शास्त्रों में वैसे तो हर माह चतुर्थी को गणेश जी की पूजा का विधान है, लेकिन भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को देश भर में धूम धाम से मनाई जाती है.
गणेश चतुर्थी का महत्व:
भगवान गजानन सभी जीवों पर दया करते हैं। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को अपने घर या मोहल्ले में विराजमान कर उनकी उपासना करता है, भगवान गणेश उनके जीवन से सभी दुखों और कष्टों को हर लेते हैं। गणेश जी को विघ्नहर्ता माना गया है। वह देवताओं में प्रथम पूजनीय हैं। कहते हैं जो भी व्यक्ति भगवान गणेश का पूजन करता है उसके जीवन में शुभता का वास होने लगता है।
ऐसे व्यक्ति के घर परिवार में कभी दरिद्रता नहीं आती है। गणेश जी की कृपा से उनकी आराधना करने वाले घरों में सदा मांगलिकता रहती है। किसी भी प्रकार का दुख, परेशानी, असफलता और कठिन परिस्थितियां ऐसे परिवार में नहीं आती हैं, जो गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश का पूजन करते हैं।
चौरचन पावन -
मिथिला अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं पर्व-त्योहारों की परंपराओं को लेकर प्रसिद्ध है. वैदिक काल से ही मिथिलांचल में पर्व-त्योहारों की अनुपम परंपरा रही है. मिथिला के त्योहारों में धार्मिक एवं ऐतिहासिक भावनायें जुड़ी है जो हमारी सांस्कृतिक चेतना को अक्षुण्ण रखती है. ऐसे ही त्योहारों में से एक है मिथिलांचल का प्रसिद्ध पर्व चौठ चंद्र. इसे स्थानीय मैथिली भाषा में चौरचन कहा जाता है.
भाद्र शुक्ल पक्ष चतुर्थी तिथि को इस पर्व को विधि-विधान के साथ मनाया जाता है. इसबार यह पर्व 22 अगस्त, शनिवार को मनाया जायेगा. मान्यता है कि चौठ चंद्र व्रत की उपासना करने से मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है. कई लोगों द्वारा कहा जाता है कि दरभंगा महाराज द्वारा इस पर्व काे प्रारंभ किया गया था.
वहीं, स्कन्द पुराण में भी चौठ-चंद्र की पद्धति व कथा का वर्णन है. खास बात यह कि छठ की तरह चौठ चंद्र पूजा को भी महिलाएं ही करती हैं. इस दिन महिलाओं एवं बच्चों में विशेष उमंग देखने को मिलता है


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